यदि किसी अच्छी आंगनवाड़ी या प्री-स्कूल में कुछ समय बिताया जाए, तो एक दिलचस्प बात जल्दी ही समझ में आ जाती है। तीन या चार साल के बच्चे लगातार सवाल पूछते रहते हैं—“यह क्या है?”, “एसा क्यों होता है?”, “मैं भी कर सकता हूँ?” उनकी जिज्ञासा बहुत स्वाभाविक होती है।
यही वह समय है जब सीखने की बुनियाद बनती है।
जमीन पर काम करते हुए अक्सर यह देखा है कि जिन बच्चों को शुरुआती वर्षों में बातचीत, कहानी, गीत और खेल के माध्यम से सीखने का अवसर मिलता है, वे आगे चलकर स्कूल में अधिक सहज दिखाई देते हैं। वे शिक्षक से बात करने में झिझकते नहीं, सवाल पूछते हैं और समूह में काम करने में भी जल्दी घुल-मिल जाते हैं।
इसके विपरीत, जिन बच्चों को शुरुआती वर्षों में ऐसा वातावरण नहीं मिलता, उन्हें औपचारिक स्कूल शिक्षा के साथ तालमेल बैठाने में कठिनाई होती है। कई बार वे कक्षा में चुपचाप बैठे रहते हैं या निर्देशों को समझने में समय लेते हैं।
इन अनुभवों से धीरे-धीरे यह समझ बनती है कि प्रारम्भिक बाल्यावस्था की शिक्षा केवल अक्षर और अंक सिखाने का प्रश्न नहीं है। यह बच्चों के भीतर आत्मविश्वास, जिज्ञासा और सामाजिक व्यवहार की बुनियाद तैयार करने की प्रक्रिया है।
समाज के व्यापक संदर्भ में इसका महत्व बहुत गहरा है। जब बच्चे छोटी उम्र से ही संवाद, सहयोग और दूसरों की भावनाओं को समझना सीखते हैं, तो वे बड़े होकर अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनते हैं।
आर्थिक दृष्टि से भी प्रारम्भिक शिक्षा एक दूरदर्शी निवेश है। जिन समाजों ने इस क्षेत्र में गंभीरता से काम किया है, वहाँ दीर्घकाल में बेहतर शिक्षा परिणाम, अधिक उत्पादक कार्यबल और कम सामाजिक तनाव देखने को मिलता है।
कई बार समृद्ध लोग कम समृद्ध वर्ग के बच्चों के बारे में बहुत सोचना नहीं चाहते। पर अगर दो मिनट यह सोचें कि एसे समाज में जहां सब बच्चे मिल कर काम करना, गुत्थियाँ सुलझाना, गहराई से सोचना न सीखे हों, वह समाज आज से 20 या 30 साल बाद कैसा दिखेगा?
इसलिए यदि कोई समाज सचमुच स्थिर और समृद्ध भविष्य बनाना चाहता है, तो उसे हर वर्ग के अपने सबसे छोटे नागरिकों की शिक्षा और परवरिश को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।


