हमारे स्कूलों में एक दृश्य बहुत सामान्य है। बच्चे सुबह स्कूल जाते हैं, फिर घर आकर होमवर्क करते हैं, और उसके बाद कई बच्चे ट्यूशन भी जाते हैं। दिन का बड़ा हिस्सा पड़ाई में ही बीतता है। ऊपर से देखने पर लगता है कि बच्चे बहुत मेहनत कर रहे हैं और शिक्षा व्यवस्था ठीक तरह से चल रही है।
लेकिन कई बार स्कूलों में शिक्षकों से बातचीत के दौरान एक अलग ही सवाल सामने आता है।
लगभग किसी भी शिक्षक से पूछिए तो एक ही बात सुनने को मिलेगी, “परीक्षा के बाद बच्जे जल्दी ही पड़ा हुआ भूल जाते हैं।” इससे धीरे-धीरे यह समझ बनती है कि पड़ाई का एक चक्र बन गया है: पड़ो → परीक्षा दो → भूल जाओ → फिर अगली परीक्षा के लिए पड़ो।
इस स्थिति में सबसे ज़्यादा महत्व अंकों को मिल जाता है। शिक्षक पर परिणाम का दबाव होता है, माता-पिता रिपोर्ट कार्ड में नंबर देखते हैं, और बच्जे भी धीरे-धीरे यही मानने लगते हैं कि पड़ाई का मुख्य उद्देश्य अच्छे अंक लाना है।
लेकिन शिक्षा का उद्देश्य इससे कहीं बड़ा होना चाहिए। जब बच्चा किसी बात को सचमुच समझता है, तब वह उसे अपने अनुभवों से जोड़ पाता है। कक्षा में कई बार एसा भी देखने को मिलता है कि जब बच्जों को चर्चा करने, प्रयोग करने या अपने विचार रखने का अवसर मिलता है, तो सीखना अधिक गहरा हो जाता है।
संत कबीर का एक प्रसिद्ध दोहा यहाँ बहुत सार्थक लगता है: “कबिरा सो धन संचिये, जो आगे को होए।” अर्थात वही संपत्ति सच में मूल्यवान है जो भविष्य में काम आए। शिक्षा भी ऐसी ही होनी चाहिए—जो जीवन भर साथ रहे, न कि केवल परीक्षा तक।
इसी सोच को ध्यान में रखते हुए National Education Policy 2020 ने शिक्षा के उद्देश्य को नए ढंग से समझने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। इसमें रटने की बजाय समझ, कौशल और अर्थपूर्ण सीखने को महत्व दिया गया है।
अंततः यह मूल प्रश्न हम सबके सामने है: क्या हम बच्जों को केवल परीक्षाओं के लिए तैयार कर रहे हैं, या जीवन को समझने के लिए?


